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गुज़ारा भत्ता : हक़ है ख़ैरात नहीं

भारतीय अपने व्यवहार में काफी धार्मिक हैं, ठीक वैसे ही जैसे यूरोपियन  लोकतांत्रिक -सर हरकोर्ट बटल तलाकशुदा मुस्लिम महिला को गुज़ारा भत्ता मिले या नहीं यह सवाल जैसे 39  साल बाद परिक्रमा कर के फिर से सर्वोच्च न्यायालय के सामने आ गया और वहां उसने फिर वही फैसला दिया है जो तब दिया था। जैसे किसी बिंदु जोड़ने वाली पहेली का हल यकायक सामने आ गया हो। साल 1985  में इंदौर की शाहबानो बेग़म ने अपने पति अहमद ख़ान से गुज़ारा भत्ता मांगा था क्योंकि उन्होंने अपनी पकी उम्र में पत्नी को तलाक़ दे दिया था और बदले में उन्हें कोई रक़म अदा नहीं की थी । उनके पांच बच्चे थे। शाहबानो अदालत गईं। भारतीय दंड विधान की धारा 125 के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने फ़ैसला   उनके हक़ में दिया लेकिन तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने देश में जारी विरोध और मोर्चों को देखते हुए हुए संविधान में संशोधन इस तरह से कर दिया कि यह क़ानून मुस्लिम लॉ बोर्ड के अनुकूल हो जाए। एक नया मुस्लिम महिला विधेयक (1986) अमल में आया। इसके हिसाब से आपसी सहमती रिश्तेदारों या फिर वक़्फ़ बोर्ड के ज़रिये गुज़ारा भत्ता देने का निर्णय हो सकता था। कोर्ट का यह महत...

सर पे लाल टोपी रूसी और ड्रैगन चीन

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नरेंद्र मोदी तीसरी बार भारत के प्रधानमंत्री का पद संभाल चुके हैं। मोदी 3.0 में विदेश नीति किस दिशा में रहने वाली है, उसे समझने के लिए हाल के दो बड़े घटनाक्रमों पर निगाह डालना ज़रूरी है। जिन दो देशों से इनका ताल्लुक है, वे दुनिया के दो बड़े मुल्क हैं और बड़ी ताकत रखते हैं। अमेरिका और रूस से जुड़े ये घटनाक्रम विदेश नीति पर रौशनी डालने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। हाल ही में रूस की यात्रा प्रधानमंत्री ने की और अमेरिका से वहां की प्रभावी प्रतिनिधि नैंसी पेलोसी भारत आईं थीं। दरअसल वे भारत में तिब्बत के आध्यात्मिक नेता और धर्मगुरु दलाई लामा से मिलने आईं थीं। नैंसी पेलोसी का संदेश साफ़ था कि चीन तुम हद में रहो और जिस तिब्बत पर तुम कब्ज़ा किये बैठे हो, हम उनके प्रमुख नेता और गुरु से मिल रहे हैं।रूस में भारत के प्रधानमंत्री ने वहां का सर्वोच्च नागरिक सम्मान हासिल किया और ऊर्जा हासिल करने को लेकर भी बड़े समझौते किये हैं। रूस चीन का बड़ा मित्र है और दोनों ही एक दूसरे का साथ हर हाल में देने की कसमें खा चुके हैं। चीन ताईवान में दखल देता है और तिब्बत पर अनाधिकृत कब्ज़ा र...

लेफ्ट राइट लेफ्ट

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बीते दिनों जिन देशों में भी चुनाव हुए ,वहां के मतदाताओं ने अलग ही संकेत दिए हैं। भारत को भी इसे अलग नहीं किया जा सकता। ईरान, इंग्लैंड और अब फ्रांस ने तो जैसे राइट की ओर  मुड़ते-मुड़ते यकायक लेफ्ट टर्न ले लिया हो। इन तीनों ही देशों के चुनावी  नतीजे  चौंकाने वाले  इसलिए कहे जाएंगे क्योंकि ईरान ने अपनी कट्टरपंथी सोच के बीच  एक उदारवादी नेता को चुन लिया है  , इंग्लैंड ने कंजर्वेटिव्स को हराकर चार सौ पार (बिना किसी नारे के बावजूद )के साथ डेमोक्रेट्स को जिता दिया और हाल ही में  फ्रांस ने तो मज़बूत नज़र आ रही धुर दक्षिण पंथी पार्टी नेशनल रैली को तीसरे नंबर पर पटक दिया है। तब क्या दुनिया की सोच फिर बदल रही है। वह ऊब गई है, नफरत की राजनीति से ,थोथे राष्ट्रवाद से, युद्ध में झोंक देने वाले नेताओं से। वह दुखी है दुनिया में जारी दो बड़े युद्धों से और उनका समर्थन करने वालों से और चाहती है कि उनके देश के नेता उदारवादी रवैये  की तरफ़  बढ़ें ना कि रूस और इजराइल के नेताओं का समर्थन कर दुनिया को युद्ध के ख़ूनी  दलदल में धकेल दें ।  तब क्या वाकई यह उम्मीद बांध...

हा हा और हाहाकार केबीच

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हा हा और हाहाकार के साथ अठारहवीं लोकसभा के नए नवेले सत्र का अंत हो गया। खूब किस्सागोई हुई, खूब तस्वीरें लहराईं गईं, मणिपुर से आए सांसद ने अपने ज़ख्म खोलकर रख दिए ,नीट परीक्षा पर सरकार ने कोई कान नहीं दिए । विपक्ष के हंगामे के बीच पानी पी-पी कर एक दूसरे को कोसा गया। इस बार  कांग्रेस ने  भारतीय जनता पार्टी की पिच पर खेलने में  कोई संकोच नहीं किया। नियम है कि संसद में कोई तख्ती या चिन्ह नहीं लाया जा सकता लेकिन लाया गया। यहां शालीनतापूर्वक अपनी बात ही रखी जानी चाहिए क्योंकि  सड़क और संसद के बीच यही फर्क है। बेशक प्रधानमंत्री ने विकसित भारत के संकल्प को दोहराया लेकिन   एक दुःखद संयोग रहा कि जब वे  विकसित भारत का ज़िक्र कर रहे थे, ठीक उसी समय हाथरस के एक गांव में मची भगदड़ ने  सैकड़ों निर्दोष महिलाओं की जान ले ली। यह देश की वह बदहाल महिला आबादी  थी जो प्रशासन की बदहाली का शिकार हो गई। अपने तमाम आभाव और परेशानियों के बीच चंद सुख के पल लेने की उम्मीद में उन्हें सुकून नहीं मौत मिली। कथित बाबा को दर्शनार्थियों की भीड़ से बचाने के लिए आयोजकों ने इन महिलाओं की...