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एक चुनाव और कई तनाव

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 'एक देश एक चुनाव' सुनने में बहुत प्रभावी और अच्छा लगता है कि एक ही बार में सब कुछ हो जाए। झंझट ही ख़त्म और उसके बाद फिर शांति से देश तरक़्क़ी की राह पर चलेगा। चुनावी ख़र्च पर भी लगाम लगेगी । शुरू में ज़रूर थोड़ी परेशानी होगी। कुछ राज्यों की विधानसभा थोड़ी पहले भंग होगी और कुछ की बाद में। यह लट्टू यानी बल्ब के उस पुराने विज्ञापन की तरह है कि पूरे घर के बदल डालूंगा। सही है लेकिन फिर भी कोई न कोई तो ख़राब होगा ही। बीच में बदलने की नौबत आएगी ही। तब क्या चुनाव के बाद ऐसा दावा किया जा सकता है कि सब एक साथ, सम पर आने के बाद कोई सरकार को तोड़ेगा-फोड़ेगा नहीं, ना पार्टियों के विधायक पाला बदलेंगे और ना ही केंद्र अपनी शक्तियों का प्रयोग कर राज्य सरकारों को भंग करेगा  आखिर 1952 से 67 तक भी तो यही होता था। पूरे देश में लोकसभा और राज्यों के चुनाव एक साथ ही होते थे। फिर केरल की सरकार को बर्खास्त किये जाने के बाद यह सिलसिला टूटा और उसके बाद तो देश ने कई भंग सरकारें, मध्यावधि चुनाव और उपचुनाव देखे। केंद्र के पास राज्यों की चुनी हुई सरकारों को बर्खास्त करने की शक्ति (अनुच्छेद 356) बनी रहेगी तब तक'ए...

मेरी प्यारी नानी और उनका गांव गणदेवी

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कल शाम जब मां से बात हो रही थी ,स्वर थोड़ा उदास लगा। उन्होंने बताया कि कल तुम्हारी नानी की अठारहवीं पुण्यतिथि है। मां से बात होने के बाद मन जैसे सुनहरे अतीत में खो गया। ननिहाल जिसकी कल्पना या हकीकत दोनों के केंद्र में अगर कोई है तो केवल नानी। नानी ने ही तो एक ऐसी दुनिया से परिचय कराया जहां प्रेम और कर्तव्य के सिवा किसी और के टिकने की कोई जगह ही नहीं थी। वह दिन-रात काम करतीं ताकि हम ढेर सारे मौसेरे भाई-बहन और उन सबकी मम्मियां ख़ुशी से अपनी छुट्टियां बिता सकें। उन दिनों हमने अपनी मां को सबसे ज़्यादा ख़ुश वहीं देखा था। परिवार और ससुराल की तमाम ज़िम्मेदारियों से कुछ दिन अलग रहकर वे किसी बच्ची -सी खिल जातीं । नानी ने ऐसे प्यारे रिश्ते दिए जो खून के तो नहीं थे लेकिन बहुत अपने थे। किन-किन का नाम लूं , गुजरात के इस छोटे से गांव गणदेवी में सब हमारे मामा और मौसियां थे। इतने बरसों में वहां जाते हुए कभी ऐसा नहीं लगा कि किसी ने भी कभी कोई दिल दुखाया हो। सिर्फ प्यार ही बरसता था,यहां तक की आस-पास बसे मां के मामा-मामियों ने भी सिर्फ दुलार ही दिया। पापा बताते हैं कि जब पहली बार मेरे नानाजी ने गांव के लोगों ...

इस छोरी में आग है?

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हरियाणा की इस छोरी का चर्चा पूरी दुनिया में है। पेरिस ओलंपिक्स का मैडल इस छोरी से गले लगते-लगते वह रह गया। कोई यह भी नहीं कह पाया कि इसकी चूक थी, वज़न नहीं बढ़ना चाहिए था। उसके साथ हमदर्दी का समंदर था। प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि देश तुम्हें पदक विजेता ही मानता है।  गलत तो कोई  तब भी नहीं कह पाया जब इसने एक बाहुबली नेता से पंगा लिया। पंगा क्या था, एक नेता की अय्याशी और मनमर्ज़ी से परदा उठाने का संघर्ष था लेकिन फिर इस परदे को ऐसा तान दिया गया कि वह खिंचा ही नहीं। उसने और उसके साथियों ने पुलिस के डंडे खाए। यह तो हाल करते हैं हम उनका जो देश का झंडा बुलंद करने के सपने के साथ जीते-मरते हैं। पदक लाने पर तस्वीरें खिंचवाते हैं और जब न्याय मांगते हैं तब खदेड़ देते हैं। अब इस छोरी ने एक नया मंच चुन लिया है। कुश्ती का दंगल छोड़ सियासत के दंगल में कूद गई है। लड़ाकू और साहसी लड़की विनेश फोगाट (30 )अब कांग्रेस की नेता हो गई हैं और विधायक का चुनाव लड़ने जा रही हैं। जीत के कितने आसार हैं उनके और उनकी पार्टी के, यह जानने से पहले कुछ उस आग के बारे में जान लेते हैं जिसका ज़िक्र रसूल हमज़ातोव ने अपनी किताब...