शब्दों के उत्सव के बाद उत्सव के शब्द
शहर लिटरेचर फेस्टिवल की गिरफ्त से बाहर आ चुका है। मौसम की तरह कुछ मेहमानों के आगमन की भी आदत शहर को हो गई है। वे वही कविताएं गुनगुनाते हैं और उन्हीं शब्दों को दोहरा कर चले जाते हैं। किताब की जमीं पर खडे़ इस उत्सव में विवाद के कंकर तो खूब थे लेकिन मन को सुकून पहुंचा सके, वैसा हरापन कम था। शब्द थे लेकिन उनसे हरितिमा गायब थी। नंदी दलितों को भ्रष्ट कह गए, तो नावरिया गांवों को ध्वस्त करने का बाण चला गए। कौन समझे कि शहर जिंदा ही गांव के दम पर हैं और आपके ठाठ को जिंदा रखनेवाले कौन थे .आप इस कदर जातिवादी कैसे हो सकते हैं . बहरहाल, जयपुर में साहित्य उत्सव भले ही अलविदा कह चुका है लेकिन हम गांधी साहित्य के आगोश में है। बापू के लफ़्ज़ों से गुजरते हुए महसूस होता है जैसे हम सरल होते जा रहे हैं। दिमाग की जटिलता पर दिल की सरलता असर करती जा रही है। दरअसल, सच्चे हो जाने का अर्थ जोर-जोर से सच बोलते जाना नहीं, बल्कि अपने जीवन को इतना पारदर्शी कर देना है कि जो भी आप कर रहे हैं या कह रहे हैं उसमें बनावट हो ही नहीं। गांधी ने अपने जीवन को वैस...