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टोपी तिलक सब लीनी

टोपी हो या तिलक  इसे  ना कहने वालों के  लिए एक  ही खयाल सामने आता है कि  ये या तो हिंदुस्तान की तहजीब से वाकिफ नहीं या फिर अपने पुरखों को नहीं मानते। ये उन लोगों का  अपमान है जो अपने मजहब का  पालन करते हुए भी सर पर हाथ रखकर तिलक  स्वीकार करते हैं, टोपी पहनते हैं, बिंदी धारण करते हैं। हमारी एक  साथी थीं । अभी दूसरे शहर हैं । भरापूरा कुनबा था उनका । दफ्तर बिंदी लगाकर आती थीं।   कभी किसी ने एतराज नहीं किया। कई साहित्यकार, लेखक , कलाकार स्वागत में तिलक स्वीकार करते हैं। दीप प्रज्ज्वलित   करते हैं। मूर्तिपूजक न होने के बावजूद ई श्वर की मूर्तियां हाथ जोड़कर ग्रहण करते हैं। तो क्या वे धर्मद्रोही हो गए, क्या ऐसा करने से इनकी आस्था घट गई या वे उस मजहब के नहीं रहे, जहां वे पैदा हुए हैं। बनारस के  गंगा घाट पर बने मंदिर के  अहाते में बिस्मिल्लाह खां साहब का शहनाई वादन तो जैसे  कुफ़्र   (पाप) हो गया। अस्वीकार एक  तरह की  फिरकापरस्ती ही है फिर चाहे वह किसी भी ओर से हो। यह अमीर खुसरो, तुलसी, गुरुना...

देह की मंडी में बिक गयी लक्ष्मी

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जयपुर में गुरुवार की  वह दोपहर काफी अलग थी। संतरी लिबास में खिली हुई महिलाओं का यूं मिलना अक्सर नहीं ही होता था। वे सब एक  फिल्म देखने के  लिए आमंत्रित की  गई थीं। प्रवीणलता संस्थान यह फिल्म इन महिलाओं को  दिखाने की  ख्वाहिश रखता था, जो काम-काजी हैं, ऊंचे पदों पर हैं और जो दृश्य बदलने की  ताकत रखती हैं। लक्ष्मी यही नाम था फिल्म का । फिल्म के  शुरू होने से पहले जो जुबां चहक  रही थीं , चेहरे दमक  रहे थे, वे फिल्म शुरू होते-होते खामोश और मायूस होते गए। सन्नाटा यकायक  कभी सिसकियों में तो कभी कराह में बदल उठता था। घटता पर्दे पर था टीस दर्शक के भीतर उठती थी।   मानव तस्करी से जुड़ी है कथा लक्ष्मी एक चौदह साल की लड़की  है। बेहद खूबसूरत और प्यारी जिसे उसका  पिता तीस हजार रुपए में बेच देता है। कसाईनुमा चिन्ना इन लड़कियों को  भेड़-बकरियों की  तरह भरकर देह की  मंडियों तक  पहुंचाता है। रेड्डी सबसे छोटी लक्ष्मी को  यह कहकर चुन लेता है कि  यह तो सबसे छोटी है फिर उसी लड़की  को घ...