उधर सौ साल और इधर ?

अँगरेज़ हुकूमत ने ख़ून से नहला दी थी वह बैसाखी आज बैसाखी है। उल्लास और उमंग का त्योहार लेकिन 100 साल पहले अंग्रेजों ने इसे ख़ूनी बैसाखी बना दिया था। निहत्थे और मासूम लोगों पर अमृतसर में ब्रिगेडियर जनरल (अस्थाई) रेजिनाल्ड डायर ने गोलियां बरसाकर बता दिया था कि वे दरअसल एक ख़ूनी फ़ौज हैं। गैर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 1600 निर्दोष इस हत्याकांड में मार दिए गए थे जबकि सरकार ने 379 मौतों की पुष्टि की थी। इस दरिंदगी के 100 साल बाद गोरों ने अफ़सोस जताया है लेकिन माफ़ी नहीं मांगी है। बीते बुधवार को ब्रितानी प्रधामंत्री थेरेसा मे ने संसद में इस कुकृत्य पर अफ़सोस प्रकट किया लेकिन माफ़ी नहीं मांगी। इससे पहले प्रधानमंत्री डेविड कैमरून भी खेद जाता चुके हैं। हम भारतीय बरसों से माफ़ी की प्रतीक्षा में हैं। उन्होंने कहा कि जलियांवाला बाग़ हत्यकांड भारत और इंग्लैंड के इतिहास पर लगा शर्मनाक धब्बा है। यह अफ़सोस भी पूरे सौ साल बाद ज़ाहिर हो सका है, बेशक थेरेसा मे उस वक़्त पैदा भी नहीं हुईं थीं लेकिन ऐसा माना जाता है कि सरकार एक लगातार चलनेवाला सिलसिला...